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Ek dukhiyari ma ki kahani

k गुजरी होगी उस बुढी मां के दिल पर जब उसकी बहू ने कहा मां जी आप अपना खाना बना लेना मुझे और उन्हें आज किसी पार्टी में जाना ह ै बुद्धि मा ने कहा बेटे मुझे गैस चूल्हा चलाने नहीं आता तो बेटे ने कहा मां आज पास वाले मंदिर में भंडारा है तुम वहां चले जाना खाना बनाने की कोई नौबत ही नहीं आएगी मां चप्पल पहनकर मंदिर की ओर हो चलें यहां पूरा वक्त का बेटा रोहन सुन रहा था पार्टी में जाते वक्त रोहन ने अपने पापा से कहा पापा जब मैं बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा ना तो मैं भी अपना घर किसी मंदिर के पास ही बनवाऊंगा मां ने बड़ी उत्सुकता अवश्य पूछा क्यों बेटा रोहन ने जो जवाब दिया उसे सुनकर बहु और बेटे का सर नीचे झुक गया जो अपनी मां के मंदिर के और छोड़ आए थे रोहन ने कहl मुझे भी ऐसे ही किसी दिन पार्टी में जाना होगा तो तुम भी किसी मंदिर में खाना खाने जाओगे ना और मैं नहीं चाहता कि तुम्हें दूर के मंदिर में जाना न परे पत्थर तब तक सलामत है जब तक वह पर्वत से जुड़ा है पत्ता तब तक सलामत है जब तक वह पेड़ से जुड़ा है इंसान तब तक सलामत है जब तक वो परिवार से जुड़ा है क्योंकि परिवार से अलग होकर आजादी तो मिल जाती है मगर संस्कार चले जाते हैं एक कब्र पर लिखा था किसको क्या इल्जाम दे दूं दोस्तो जिंदगी में सताने वाले भी अपने थे और दफनाने वाले भी अपने थे यदि अच्छा लगे तो शेयर करना दोस्तों फिर मिलेंगे एक और कहानी के साथ आपके दिल को छू लेने वाला धन्यवाद

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